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आत्महत्या – एक मानसिक ह्रास

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अवलोकन

  • दुनिया के साथ-साथ भारत में भी हर सातवें या आठवें व्यक्ति को मानसिक विकार है।
  • विश्व भर के कुल मानसिक और नशीले द्रव्य का सेवन करने वाले रोगियों में से 15% भारतीय होते हैं।
  • भारत में हर 4 मिनट में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है । (2016 के आंकड़ों के अनुसार)
  • भारत में आत्महत्या करने वाले लोगों की अधिकतम संख्या 15 से 29 वर्ष के बीच की आयु वाले लोग हैं।

विषय – सूची

  1. आत्महत्या
    1. मनोवैज्ञानिक कारण और व्याख्या
    2. प्रमुख कारण
  2. मानसिक स्वास्थ्य
    1. चिंता, अवसाद या डिप्रेशन
    2. WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) की रिपोर्ट
  3. साक्षरता और सामाजिक जागरूकता
    1. अंधविश्वास और इनका खंडन
  4. सर्वाधिक जोखिम कब?
    1. उम्र और लिंगानुपात
  5. अंत में

1. आत्महत्या

अतीत और भविष्य एक दूसरे का अनुसरण (पीछा) करते हैं!

लाओ त्सू

यह हमेशा चिंता और जलन के साथ एक सामान्य अवसाद से शुरू होता है। जैसे-जैसे दिन बीतते हैं, ये अवसाद और चिंता एक आदत बन जाती है। हालाँकि ये सामान्य समस्या आम तौर पर दूसरे लोगों के लिए किसी तरह की परेशानी नहीं खड़ी करती, लेकिन फिर समय के साथ ये समस्या और भी जटिल रूप लेने लगती है। गुस्सा और विषाद जैसी आदतें व्यक्ति पर हावी होने लगती हैं। ये बदलाव इंसान में कुछ इस तरह होते हैं कि उसे इनका पता तक नहीं लग पाता।

हम मानव समाज की बहुत ज़्यादा उपेक्षित मगर साथ ही बहुत गंभीर समस्याओं में से एक, यानि मानसिक विकार के बारे में बात कर रहे हैं। निरंतर अवसाद, अत्यधिक चिंता और ईर्ष्या / जलन इस विकार के प्रारंभिक चरण हैं। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) के अनुसार, दुनिया का हर सातवाँ या आठवाँ व्यक्ति किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित है। इससे पहले कि वह इसे विकार के रूप में पहचान सके, उसके लिए एक खतरनाक रूप ले लेते हैं। डरावना पहलू यह है कि ये बहुत धीरे-धीरे विकसित होते हैं, और पीड़ित की आदत को ही बदलते हैं। यह हद तक नशे की तरह है जिनसे छुटकारा पाना बहुत मुश्किल है। अगर यह वर्षों तक जारी रहता है, तो एक मरीज सामान्य परिस्थितियों में भी हताश और बेचैन हो जाता है। जरा सी असावधानी भी उसे परेशान करने लगती है। चीजों को सर्वोत्तम बनाने और उन्हें प्रबंधित करने का जुनून इसका एक प्रकार है। इसे ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (OCD) के रूप में जाना जाता है। 

यह जुनून पीड़ितों के लिए स्थायी चिंता का कारण बन जाता है। अपने कार्यों को पूरा करने में कोई भी विफलता उनकी निराशाजनक वार्ता और किसी भी सामाजिक बातचीत में स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है। इसके अलावा, यह भी देखा जाता है कि धीरे-धीरे ऐसे लोग खुद के साथ ही रहना पसंद करते हैं। वे अकेलेपन को ही अपना साथी बना लेते हैं।

इन सभी संकेतों को चेतावनी के रूप में समझा जा सकता है। यही बेहद सूक्ष्म समस्याएं अंजान रुप से रोगी के ऊपर हावी होने लगती हैं। लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि- ज्यादातर लोग इन समस्याओं को समय रहते पहचान नहीं पाते हैं।

आत्महत्या वह बुरा सपना है, जिसकी शुरुआत चिंता और आक्रोश जैसे उन बेहद सामान्य मानसिक विकारों से होती है, जिन्हें वास्तव में हम विकार ही नहीं मानते!

ये जुनून और निराशा कुछ लोगों को इतने गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं, कि उनके लिए ज़िन्दगी वह बोझ बन जाती है, जहाँ मात्र दुःख, विषाद और मुसीबतें ही हों। यह वही शुरुआती विषाद है जो वर्षों में बेहद हावी हो चूका होता है। अंततः पीड़ित को इस बिमारी से छुटकारा पाने के लिए केवल एक ही रास्ता मिलता है – आत्महत्या।

सभी चीजें वास्तव में परस्पर जुड़ी हुई हैं। लिहाज़ा अचानक दिखाई देने वाली हर चीज़ उन घटनाओं के परिणाम है जो कहीं-न-कहीं अनदेखी रह जाती हैं। और अचानक से आत्महत्या जैसी भयानक खबर मिलती है !!

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या की हालिया खबर ने हमारे देश को मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या के विषय का विश्लेषण करने के लिए मजबूर कर दिया है। इसी प्रक्रिया में भारत सरकार को डेटा पोर्टल data.gov.in से एकत्र किए गए आत्महत्या डेटा (2001-12) का विश्लेषण करने के बाद, हमने पाया कि आत्महत्याओं की संख्या में कुछ वर्षों से वृद्धि हुई है।

सभी श्रेणियों की आत्महत्या की कुल संख्या (2001-2012)

यदि हम विभिन्न राज्यों की संख्या के बारे में बात करते हैं, तो हमारी टीम ने पाया कि महाराष्ट्र ने आत्महत्याओं की अधिकतम संख्या यानी 901945 की सूचना दी है। यह वितरण निम्नलिखित मानचित्र में देखा जा सकता है:

विभिन्न राज्यों में दर्ज आत्महत्या के मामले (2001-2012)

यह देखना बहुत डरावना है कि देश में आत्महत्याओं की संख्या कितनी तेजी से बढ़ रही है। इसने हमें समस्या अर्थात मानसिक स्वास्थ्य में गहराई से काम करने के लिए मजबूर किया और यह पता लगाया कि लोग आत्महत्या क्यों करते हैं।

1.1. मनोवैज्ञानिक कारण और व्याख्या

आत्महत्या अचानक प्रतिक्रिया नहीं है। वास्तव में यह उस मानसिक विकार का अंतिम दुःस्वप्न है जिसे कई मामलों में समस्या भी नहीं माना जाता है।

Data.gov.in से एकत्र आंकड़ों के अनुसार, कुल आत्महत्या के मामलों को 5 अलग-अलग हिस्सों में वर्गीकृत किया गया है। ये सभी भाग उस व्यक्ति से संबंधित कुछ विशिष्ट प्रकार की सूचनाओं का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने आत्महत्या की है।

  • Profession (1439243 मामले) : व्यक्ति के पेशे के बारे में बताता है
  • Causes (1440974 मामले) : आत्महत्या के पीछे सबसे संभावित कारण के बारे में बताता है।
  • Educational Status (1455931 मामले) : उसकी शैक्षणिक योग्यता के बारे में बताता है
  • Means Adopted  (1455931 मामले) : जिस तरह से वह आत्महत्या करता है, उसे पहले से संकेत करता है।
  • Social Status (1455931 मामले) : सामाजिक / वैवाहिक स्थिति के बारे में जानकारी देता है।

गहराई में जाने के बाद, हम पाते हैं कि आत्महत्या करने का निर्णय कई कारकों पर निर्भर करता है। ये कारक उन लोगों के बारे में कुछ जानकारी देते हैं जिन्होंने 2001-2012 के दौरान आत्महत्या कर ली थी। इन सूचनाओं में शामिल हैं कि लोग कितने योग्य थे ?, उनका पेशा या सामाजिक स्थिति क्या थी? , और भी काफी कुछ।

1.2. प्रमुख कारण

निम्न चार्ट देखने से पता चलता है,उन प्रमुख कारणों के बारे में जो किसी को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करते हैं।

आत्महत्या के कुछ प्रमुख कारण

उपरोक्त दृश्यों से, यह स्पष्ट है कि लोगों द्वारा उठाए गए इस चरम कदम के लिए परिवार की समस्याएं प्रमुख कारण होती हैं। इस डेटा को और भी विस्तार से देखने पर पता चलता है कि ज्यादातर मामलों में लोग फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेते हैं ।

आत्महत्या में मृत्यु के कारककुल मामले (2001-2012)
फांसी460,955
ज़हर231,178
आग128,006
डूब जाना96,711
रेल / सड़क दुर्घटना45,299
आत्महत्या में मृत्यु के कारक

यह स्पष्ट है कि इस तरह की व्यवस्था करने के लिए, एक व्यक्ति को अकेले निजी समय की बहुत आवश्यकता होती है। यह इंगित करता है, जो आत्महत्या करने वाला है वह समाज से खुद को अलग करना शुरू कर देता है। यह अकेलापन अवसाद के लिए सबसे आम लक्षणों में से एक है। इन्हें संकेत के रूप में देखा जा सकता है, किसी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर या अनजाने में जारी किया गया, जो आत्महत्या करने वाला है।

एक बार आत्महत्या करने वाले व्यक्ति की पहचान की जा सकती है। अच्छे मनोवैज्ञानिक सलाहकारों की कमी से स्थिति और खराब हो जाती है।

2. मानसिक स्वास्थ्य

अवसाद और चिंता सबसे आम मनोवैज्ञानिक विकार हैं। एक बार अवसाद मनुष्य को पूरी तरह पकड़ लेता है तो, गंभीर मानसिक विकार बढ़ने लगते हैं। इन समस्याओं में आचरण विकार, या आक्रामक हो जाना, और साथ ही स्किज़ोफ्रेनिया जैसी दुर्लभ बीमारियां शामिल हो सकती हैं

डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार, मानसिक स्वास्थ्य दुनिया भर में काफी कम आंका जाने वाला विकार है। ज्यादातर, मरीजों को उचित ध्यान न देने के कारण ही स्थितियाँ जटिल हो जाती हैं। वास्तव में, बहुत सारे अंधविश्वास या अफवाहें हैं जो लोगों के किसी भी तरह के मानसिक विकार को स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में नहीं मानते हैं।

2.1. चिंता, अवसाद या डिप्रेशन

WHO की एक रिपोर्ट की माने तो अकेले भारत में, कुल जनसंख्या का लगभग 7.5% क‌ई प्रकार के मानसिक विकार से पीड़ित है। 

अध्ययनों से पता चलता है कि – लगभग 14.4% महिलाएं और 14.2% पुरुष किसी न किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं। इन रोगियों में सबसे अधिक पाए जाने वाले विकारों में प्रारंभिक बौद्धिक विकलांगता और विषादग्रस्तता विकार शामिल हैं। जबकि, ईटिंग डिसऑर्डर और सिज़ोफ्रेनिया जैसे असाधारण विकार भी कुछ रोगियों में पाए जाते हैं। यह पूरा अध्ययन 2017 में किया गया था।

इस अध्ययन की अधिक जानकारी यहाँ उपलब्ध है।

2.2. WHO (विश्व स्वास्थ्य संगठन) की रिपोर्ट

पाया गया है की – हर 6 रोगियों में से 1 किसी न किसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त होता है। इसके अलावा, भारत में मानसिक अस्वस्थता के इलाज के लिए लगभग 4000 ही विशेषज्ञ उपलब्ध हैं। अध्ययन से यह पता चलता है कि देश के हर 1 लाख लोगों के लिए केरल में लगभग 1.2 मनोचिकित्सक हैं, जबकि मध्य प्रदेश में यह संख्या मात्र 0.05 तक ही सीमित हैं।

आंकड़े यह भी बताते हैं कि हर 5 में से 1 बच्चा मानसिक रूप से कमजोर है। 14 वर्ष की कम उम्र में ये मानसिक विकार सबसे अधिक प्रभावित करते हैं।

पूरी दुनिया में हर 40 सेकंड में 1 व्यक्ति आत्महत्या करता है, जबकि भारत में यह अवधी 4 मिनट है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि – हर साल लगभग 800 000 लोग आत्महत्या कर लेते हैं । आम तौर पर इसका मतलब है कि हर 40 सेकंड में कम से कम 1 व्यक्ति आत्महत्या करता है। वहीँ हमारे अध्ययन के अनुसार, भारत में यह अवधी 4 मिनट है।

3. साक्षरता और सामाजिक जागरूकता

बहुत से लोग तनाव और अवसाद से पीड़ित हैं। पाया गया है कि अवसाद/चिंता के कारण, वैश्विक अर्थव्यवस्था को सालाना लगभग 1 खरब डॉलर का नुक्सान होता है। ध्यान देने योग्य बात है कि – न तो पीड़ित और न ही उसके सहयोगियों को पता होता है कि इस परिस्थिति से कैसे निपटना है। कम नींद और लंबे समय तक काम करने से भी व्यक्ति चिंताग्रस्त हो जाता हैं।

एक ओर जहाँ शिक्षा से जिम्मेदारी और दबाव बढ़ता है वहीं दूसरी ओर यही शिक्षा उन्हें समस्याओं से निपटने का रास्ता भी दिखती है। हमने पुराने आत्महत्या मामलों का शिक्षा के स्तर पर विश्लेषण किया। इससे पता चलता है कि जैसे-जैसे शिक्षा का स्टार बढ़ता है और लोग परिपक्व होते हैं, वे तनाव प्रबंधन में भी बेहतर हो जाते हैं।  

आत्महत्या करने वाले लोगों की शैक्षिक स्थिति

3.1. अंधविश्वास और इनका खंडन

गैर-जागरूकता के कारण समाज में बहुत सारे अंधविश्वास भी फैले हुए हैं। इन अंधविश्वासों ने दुनिया की स्थिति को और भी खराब कर दिया है। दुनिया के कुल देशों में आधे से ज्यादा के पास मानसिक स्वास्थ्य नीतियां और योजनाएँ नहीं हैं। इनमें से कई देशों में मानसिक रोगियों के मानवाधिकारों से भी समझौता किया जाता है। कई अंधविश्वासों ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई हैं। कई मामलों में लोग इस तरह के अंधविश्वासों के प्रभाव में मनोवैज्ञानिक के बजाय कुछ बाबाओं के पास जाना पसंद करते हैं। इस तरह की अफवाहों की सामाजिक स्वीकृति के पीछे दो प्रमुख कारण हैं – अशिक्षा और मनोरोग परामर्श की कमी। 

हमने आत्महत्या के उन आंकड़ों को पेशे के आधार पर व्यवस्थित करने की कोशिश की है, जिन्होंने 2001-2012 के दौरान आत्महत्या कर ली थी। 

इस प्रयास ने हमें निम्नलिखित परिणामों तक पहुँचाया: 

यहाँ, हम देखते हैं कि घर की महिलाओं के बाद, किसानों की आत्महत्या करने की संभावना सबसे अधिक है। जैसा की सभी जानते हैं, भारत में अधिकांश किसान ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं, जहाँ ज्यादातर अच्छे अस्पतालों और शिक्षा के बुनियादी ढांचे का अभाव है।

अशिक्षा अंधविश्वास को जन्म देती है। किसी मानसिक विकार को एक उपचार योग्य बीमारी मानने के बजाय, कुछ लोग इसे भूत-प्रेत के रूप में देखने लगते हैं। 

कभी-कभी ये अंधविश्वास पीड़ितों को हत्या की ओर भी ले जाते हैं। 

4. सर्वाधिक जोखिम कब?

इस खंड के आगामी भाग में, हमने इसका पता लगाने का प्रयास किया है कि कब किसी को भावनात्मक समर्थन और एक उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता सबसे अधिक होती है, जो अगर समय पर न मिले तो परिस्थितियां आदमी को आत्महत्यातक भी ले जा सकती हैं।

4.1. उम्र और लिंगानुपात

यहाँ हमने उनके आयु समूहों और लिंग के आधार पर मामलों की कुल संख्या को विभाजित करने का प्रयास किया है। 

क्रमशः कुल आत्महत्या मामलों का आयु-समूह और लिंग का वर्गीकरण

ऊपर दिए गए ग्राफ से पता चलता है कि – जिन आत्महत्या पीड़ितों का हमने विश्लेषण किया है, उनमें लगभग 64.1% पुरुष और 34.9% महिलाएँ हैं। साथ ही, यह भी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में सबसे अधिक आत्महत्या का प्रयास युवा लोग (15-29 वर्ष) कर रहे है (छायांकित लाल)। किशोरावस्था के दौरान, जीवन एक बड़ा मोड़ लेता है। यही कारण है कि इस उम्र के बच्चों पर कुछ विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

भारत, दूसरा सर्वाधिक आबादी वाला देश होने के साथ-साथ  दुनिया भर में युवा नागरिकों यानी 3.56 अरब नागरिकों का घर है, जो इसकी कुल आबादी का 26.8% है। यदि हम इसे एक सकारात्मक पक्ष से देखें, तो हम पाएंगे कि इस युवा शक्ति की बदौलत भारत के पास अधिक तेजी से विकास करने का सुनहरा अवसर है। लेकिन, दूसरी तरफ, उपरोक्त आँकड़े वास्तव में देश के लिए एक ख़तरे की घंटी हैं!

भारत को किशोरावस्था के दौरान बच्चों की उचित काउंसलिंग सुनिश्चित करते हुए समाया रहते अपने भविष्य की को बेहतर बनाने की ओर सही कदम उठाना होगा। 

एक ऐसा देश, जिसकी 66% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों से आती है, उन्हें उचित और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए ध्यान केंद्रित करना चाहिए। भारत को मानसिक विकारों के बारे में अंधविश्वास को मात देने और युवाओं को तनाव से बाहर रखने के लिए लोगों में एक उचित सामाजिक जागरूकता विकसित करने की आवश्यकता है।

5. अंत में

इस पूरे अध्ययन के बाद, यह साफ़ हो जाता है कि आज ग्रामीण भारत और देश की युवा आबादी पर मानसिक बीमारी का प्रभाव सर्वाधिक है। जिस देश में मानसिक रोग के मामलों में लगातार बढ़त दर्ज की जा रही हो, उसे अपनी मानसिक स्वास्थ्य नीति का पुनःमुल्यांकन करने की बहुत ज़्यादा आवश्यकता है। आज भारतीय युवा आबादी न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनियां के विकास में एक बड़ा योगदान देने की क्षमता रखती है। ऐसा देश जिसने तक्षशिला की स्थापना के साथ ही विश्वविद्यालय की नींव रखी थी, आज उसकी अपनी जनता तक ही अगर प्राथमिक शिक्षा न पहुँच पा रही हो तो यह बेहद निराशजनक बात है। एक देश जिसने विश्व भर को बुद्ध और विवेकानंद सहित कई सर्वोच्च विचारक दिए हों, वहाँ का हर सातवाँ व्यक्ति अगर मानसिक-विकारों से ग्रस्त पाया जाए तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण बात है।

इस अध्ययन ने हमारी टीम को इस निष्कर्ष पर पहुंचाया है कि साक्षरता बढ़ने के साथ आत्महत्या की संभावना कम हो जाती है। हमें नागरिकों के जीवन में शांति और आशा बनाए रखने के लिए उन्हें मानसिक स्वास्थ्य के प्रति अच्छे उपचार और जागरूक करने की आवश्यकता है। लोगों को उचित सलाह भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। हमें सुनिश्चित करना होगा कि परिवारों के बीच एक समन्वय भी बना रहे क्योंकि आत्महत्याओं के पीछे ‘पारिवारिक समस्याएं’ सबसे बड़ी वजह हैं। आत्महत्या की दर कम करने में किशोरों का उचित मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण है।

ध्यान रहे – हमें अपने अतीत से सीख लेते हुए भविष्य को बेहतर बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि, लाओ त्सू के अनुसार – “अतीत और भविष्य एक दूसरे का अनुसरण (पीछा) करते हैं!”

3 comments

  1. समस्त प्राणी समुदाय मृत्यु शब्द से ही कंपित हो जाता है। विपरीत इसके वह स्वैच्छिक मृत्यु का चयन करता है । इसका मूल जानना जरूरी हो जाता है। कारण कुछ भी हो सकता है जैसे :-
    सामाजिक व मानसिक यातना , किसी प्रोफेशन में असफलता , घर का वातावरण, खुद के साथ नकारात्मक सोच इत्यादि। यदि समय पर ऐसे व्यक्ति को सही तरह से उपचार दिया जाए तो स्थिति को सामान्य अवस्था में नियंत्रित किया जा सकता है। अथवा लाया जा सकता है। प्यार की भाषा से काफी हद तक इस बीमारी को ख़तम कर सकते है।
    रवि ! लेख अच्छा व आत्महत्या के प्रति सजग करने वाला है। आप अपने लेखन द्वारा समझ के लोगो का ज्ञानवर्धन करते रहे।
    धन्यवाद…

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