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भारत में आपातकाल: लोकतांत्रिक ग्रहण की अवधि

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अवलोकन

  • 25 जून 2020 को इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल से भारत 45 साल आगे बढ़ गया।
  • डेटा ट्रिब्यून इमरजेंसी की पूरी कहानी तथा देश पर इसके असर की समीक्षा ले कर प्रस्तुत है।

विषय – सूची

  1. परिचय
  2. भारतीय संविधान में आपातकाल क्या है?
    1. राष्ट्रीय आपातकाल 
    2. राज्यों में संवैधानिक मशीनरी की विफलता 
    3. वित्तीय आपातकाल 
  3. 1975 में क्या हुआ था?
  4. वे घटनाएं जिन्होंने भारत को आपातकाल की ओर अग्रसर किया
  5. आपातकाल के परिणाम
  6. डेटा द्वारा सही तथ्य
    1. सकल घरेलू उत्पाद
    2. आबादी 
    3. गरीबी दर
    4. साक्षरता
    5. अन्त में

1. परिचय

1975-1977 के आपातकाल को स्वतंत्र भारत के सबसे काले दिनों में से एक माना जाता है। यह वह समय था जब आपातकाल ने लोकतंत्र को कैद कर लिया था। इसकी शुरूआत राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को मिले एक पत्र से हुई। पत्र में उनको ‘आँतरिक अव्यवस्था’ का हवाला देते हुए आपातकाल घोषित करने का सुझाव दिया गया था। 

2. भारतीय संविधान में आपातकाल क्या है?

आपातकाल एक अप्रत्याशित रूप से उभरी हुई स्थिति है जिसका प्रयोग प्रशासन, संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का प्रयोग करके किसी भी निर्णय को लागू करने तथा बिगड़ती स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कर सकता है। भारत के आपातकालीन कानूनों को इस तरीके से परिभाषित किया गया है कि- जब विकट स्थिति उत्पन्न होती है तो संविधान संघीय सरकार को एकल सरकार की शक्ति प्राप्त करने की अनुमति देता है। भारतीय आपातकाल के तीन प्रकार हैं:

1. राष्ट्रीय आपातकाल

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 में राष्ट्रीय आपातकाल को परिभाषित किया गया है। यह ऐसी दशा में लगाया जाता है जब भारत या उसके किसी भी क्षेत्र की सुरक्षा को गंभीर खतरा होता है। यह खतरा निम्नलिखित कारणों से हो सकता है:

  • युद्ध
  • बाहरी आक्रमण
  • सशस्त्र विद्रोह

2. राज्यों में संवैधानिक मशीनरी की विफलता

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 256 राज्यों में संवैधानिक व्यवस्था की विफलता की परिस्थिति में आपातकाल लगाने की बात करता है। इसे राष्ट्रपति शासन के रूप में भी जाना जाता है। यदि राष्ट्रपति को यह ज्ञात हो कि सरकार को संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार चलाया नहीं जा सकता है, तो वह राज्य में आपातकाल जारी कर सकता है।

3. वित्तीय आपातकाल

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 के तहत राष्ट्रपति के पास उस स्थिति में वित्तीय आपातकाल की घोषणा करने की क्षमता है जब उसे लगे कि राष्ट्र या कोई विशेष क्षेत्र वित्तीय रुप से अस्थिर है।

3. 1975 में क्या हुआ था?

यह भारतीय लोकतंत्र के सबसे काले समय में से एक की कहानी है। इस आपातकाल की घोषणा राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून की रात को अनुच्छेद 352 के तहत की थी। लंबे समय के संघर्ष के बाद जो लोकतंत्र प्राप्त हुआ, उसने एक रात में ही अपना मूल ढांचा खो दिया। श्रीमती गाँधी के सुझाव पर राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल लागू किया गया था। उसके बाद, उसी रात प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे और भारतीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष देव काँत बारोहा द्वारा एक भाषण तैयार किया गया था। वे यह विचार कर रहे थे कि लोगों को आंतरिक आपातकाल के बारे में कैसे बताया जाए। उसके बाद, 15 सदस्यों के साथ एक कैबिनेट बैठक तय की गई थी ताकि उन्हें यह बताया जा सके कि आपातकाल घोषित कर दिया गया था और कुछ नेताओं को गिरफ्तार किया गया था। सिद्धार्थ को गृह मंत्री ओम मेहता से पता चला कि संजय गांधी के आदेश पर प्रेस क्षेत्रों की बिजली की आपूर्ति काट दी गई है। इस कारण से आँतरिक आपातकाल पर कोई भी समाचार पत्र प्रकाशित नहीं किया जाएगा और सभी उच्च न्यायालय बंद कर दिए जाएँगे। ऐसा महसूस किया जा रहा था  कि इंदिरा गांधी के बेटे द्वारा लोकतंत्र का शोषण किया जा रहा है। इंदिरा के साथ बात करने पर यह आश्वासन मिला कि ऐसा कुछ नहीं होगा। अगली सुबह उच्च न्यायालय खुले थे लेकिन कुछ ही समाचार पत्र प्रकाशित हुए। इसका मतलब यह था कि कोई अन्य व्यक्ति आयरन लेडी के पीछे छिपकर फैसले ले रहा था।

संजय ने टेलीकास्ट से पहले सभी समाचार बुलेटिनों को मंजूरी लेने की भी मांग की। उन्होंने सभी विश्वविद्यालय व्याख्याताओं और आरएसएस से संबंधित प्रोफेसरों की सूची भी मांगी। इसके बाद इंदिरा गांधी ने भी अपने बेटे का समर्थन किया और एक सचिव चाहती थीं, जो टेलीकास्ट से पहले पीएम हाउस को सभी समाचार प्रस्तुत करे। अब यह स्पष्ट था कि कौन शासन कर रहा था। अंततः 26 जून 1975 को सुबह 8 बजे लोगों को आपातकाल के बारे में पता चला। इंदिरा का भाषण रेडियो पर जारी किया गया। वो इस प्रकार था:

“राष्ट्रपति ने एक आंतरिक आपातकाल की घोषणा की है। इससे घबराने की कोई बात नहीं है ”।

उन्होने यह भी दावा किया कि एक व्यक्ति सरकार के खिलाफ सैनिकों को उकसा रहा था। वह व्यक्ति कोई साधारण व्यक्ति नहीं था, वह जय प्रकाश नारायण, एक भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता थे, जिसे 1942 के “भारत छोड़ो आंदोलन के नायक” के रूप में भी जाना जाता है। 

जैसा कि संविधान में प्रावधान है, श्रीमती गांधी ने राष्ट्रपति से आग्रह किया कि वे हर छह महीने के बाद आपातकाल की अवधि को बढ़ाएं जब तक कि उन्होंने 1977 में इसे हटाने का फैसला नहीं ले लिया। यह आपातकाल 21 मार्च 1977 तक रहा। 

4. वे घटनाएं जिन्होंने भारत को आपातकाल की ओर अग्रसर किया

घटनाओं की एक श्रृंखला थी जिसके कारण आपातकाल लगा। भारतीय संविधान के अनुच्छेदों के अनुसार शर्तों के अनुसार कोई भी इमरजेंसी सुपाच्य है। लेकिन 1975 के आपातकाल का मकसद, सभी को अधिनियम के बजाय अलग-अलग दिखाई दिया। 

1971 के शुरू में, इंदिरा गांधी के नारे ‘गरीबी हटाओ’ ने नागरिकों को सकारात्मक रूप से प्रभावित किया। परिणामस्वरूप, इन्दिरा ने विपक्षी पार्टी को 1 लाख से अधिक मतों से हराया और उसी वर्ष पाकिस्तान के खिलाफ भारत की जीत उसकी बढ़ती प्रसिद्धि का दूसरा कारण बन गई। वह राजनीति में प्रसिद्धि की ओर थीं। इन सबके बीच, एक भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता राज नारायण ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनावी धाँधली का मामला दर्ज कराया। सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनके दो मतों की कड़ी आलोचना की:

  • उन्होंनें 14 निजी बैंकों को सरकार के अधीन कर लिया। 
  • वे वृद्ध राजाओं की पेंशन व भत्ते के विरोध मे थीं।

सुप्रीम कोर्ट के इस विरोध ने इंदिरा के अहंकार को गहरी चोट पहुंचाई, और यह संसद और न्याय व्यवस्था के बीच विवादों का कारण बना। जवाब में इंदिरा ने अपने पक्ष में न्याय और संविधान में संशोधन करने का फैसला किया जिसके परिणाम अनुच्छेद 24 और अनुच्छेद 25 थे। 

5 नवंबर 1971 को, अनुच्छेद 24 की घोषणा की गई, जिसमें प्रावधान किया गया कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से को बदल सकती है, भले ही इससे संविधान का मूलभूत ढाँचा बदल जाए। अप्रैल 1972 में, अनुच्छेद 25 में संशोधन किया गया, जिसका उपयोग बैंक राष्ट्रीयकरण जैसे मामलों में परिवर्तन करने के लिए किया गया था जिसमें इंदिरा की हार हुई थी। लेकिन, केशव नंद भारती केस ने उनके फैसले को पलट दिया। न्यायपालिका की निरंतर आलोचना से इन्दिरा विचलित हो उठीं। केशव नंद भारती मामले के अंतिम बयान के बाद, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सर्वमित्र सिकरी सेवानिवृत्त हो गए। और नए जज ए एन रे थे, जो अपने से उच्च पद पर आसीन तीन प्रमुख न्यायाधीशों को नजर अंदाज कर नियुक्त किए गए थे।

1972 में, इन्दिरा ने समय से पहले बिहार, पंजाब और हरियाणा जैसे कुछ भारतीय राज्यों की विधानसभा को भंग कर दिया। 1972 के चुनाव का परिणाम तमिलनाडु को छोड़कर सभी राज्यों के लिए कांग्रेस पार्टी के पक्ष में था। उनकी राजनीति में उन्नति के साथ उनके खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक मामला चल रहा था जिसे राज नारायण ने दायर किया था। 

1975 में 28 मार्च को प्रधानमंत्री को अदालत में प्रस्तुत होना पड़ा। उनसे 5 घंटे तक पूछताछ की गई। ऐसा महसूस हुआ कि परिस्थितियाँ इन्दिरा के खिलाफ जा रही हैं। 23 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनके चुनावी धांधली पर फैसले को संरक्षित कर लिया। अंत में, 12 जून को फैसला आ गया। इंदिरा का चुनाव लड़ने का अधिकार छह साल के लिए खारिज कर दिया गया। 

दूसरी ओर, दिल्ली में राम लीला मैदान में जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में एक आंदोलन  किया गया, जिसमें लगभग 5 लाख लोगों ने भाग लिया। इन्दिरा को लग रहा था कि उसके शासन के लिए सभी दरवाजे बंद हो रहे थे। उनके पास कोई विकल्प नहीं बचा था। इन सभी स्थितियों से प्रभावित होने वाली एकमात्र चीज कांग्रेस पार्टी की राजनीति थी। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए, इन्दिरा ने अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा करने का फैसला किया। अंततः 25 जून की रात को राष्ट्रपति को एक पत्र भेजा गया, जिसमें आपातकाल की घोषणा करने की मांग की गई थी।

अगला खंड आपातकाल के बाद की स्थिति के बारे में बात करता है।

5. आपातकाल के परिणाम

आपातकाल की उद्घोषणा के साथ, लोकतंत्र की भावना सहित बहुत सारी चीजों को संविधान में बदल दिया गया। कांग्रेस बिना किसी प्रतिबंध के किसी भी अवधि के लिए शासन कर सकती थी। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव भी आवश्यक नहीं थे। मीडिया और समाचार पत्र अपनी इच्छा के अनुसार पढ़ने और लिखने के लिए स्वतंत्र नहीं थे और संसद अपने बहुमत के आधार पर किसी भी कानून को पारित करने में सक्षम थी। एक धर्मनिरपेक्ष संविधान जिसने इसे एक विशेष पहचान दी, वह भी खो गया। बहुमत के लिए ही निर्णय लिए गए। अनुच्छेद 19, अनुच्छेद 21 जो क्रमशः स्वतंत्रता और जीवन की सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का दावा करते हैं, को भी खारिज कर दिया गया था। जनता दो खेमों में ध्रुवीक्रित हो रही थी। एक हिस्सा सत्ता के इर्द-गिर्द घूम रहा था और दूसरा सच और लोकतंत्र की रक्षा करना चाहता था। 

उस रात के बाद जय प्रकाश नारायण सहित कई विरोधी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।  कुछ न्यायाधीशों और मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया जिन्होंने संसद के निर्णय को स्वीकार नहीं किया। कई लोगों ने संसद का जोरदार विरोध किया जबकि उनमें से कुछ समर्थन में थे। नतीजतन कई सवाल उठने लगे, जैसे-

मुख्य अपराधी कौन था? क्या यह संजय गांधी, या इंदिरा गांधी, या वे मंत्री थे जो कैबिनेट मंत्रियों की बैठक में शामिल हुए, उन्होंने इंदिरा के फैसले को सुना लेकिन उन्होंने प्रश्नकाल के दौरान उन पर सवाल उठाने की कोशिश नहीं की, और न ही गलत होने पर इस्तीफा दिया? या यह जय प्रकाश नारायण ही थे जो लोकतंत्र की रक्षा के लिए आंतरिक अशांति भड़का रहे थे? क्या वे लोग सही थे जो लोकतंत्र की अस्मिता को कुचल कर चुपचाप शांति बनाए रखना चाहते थे? उस आपातकाल को आंतरिक अशांति को नियंत्रित करने के लिए घोषित किया गया था या सत्ता पर कायम रहने के लिए?

इन सभी सवालों के जवाब जनता ने 1977 में दिए, जब आपातकाल हटा लिया गया था। जवाब कांग्रेस पार्टी के खिलाफ, इंदिरा गांधी के खिलाफ, संजय गांधी के खिलाफ था। वे चुनाव में हार गए थे। वे सत्ताधारी नहीं थे।

अगले भाग में हम राष्ट्र पर आपातकाल के असर को समझने का प्रयास करेंगे।

6. डेटा द्वारा सही तथ्य

आपातकाल के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा घोषित बीस सूत्रीय आर्थिक विकास कार्यक्रम थे। दिलचस्प बात यह है कि संजय गांधी ने भी पिछड़े समुदायों की दुर्दशा को सुधारने के लिए अपना 5  बिन्दु का कार्यक्रम घोषित किया। ये 5 बिंदु कार्यक्रम थे:

  • साक्षरता
  • परिवार नियोजन 
  • दहेज उन्मूलन
  • वृक्षारोपण 
  • जातिवाद

इस खंड में आपातकाल के दौरान देश की वृद्धि को समझने के लिए आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। ग्राफ के लिए उपयोग किए गए डेटा को विश्वबैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर पाया जा सकता है । 

1. सकल घरेलू उत्पाद

सकल घरेलू उत्पाद दिए गए वर्ष में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की कुल लागत से परिभाषित होता है। यह किसी राष्ट्र की आर्थिक वृद्धि के बारे में जानकारी देता है। भारत के जीडीपी के नीचे दिए गए ग्राफ में वर्ष 1960 से 1980 के दौरान प्लॉट किया गया है।

यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि 1975-77 के दौरान जीडीपी विकास में बहुत बदलाव नहीं हुआ। अर्थव्यवस्था पर आपातकाल का बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। 

2. आबादी 

संजय गांधी द्वारा घोषित 5 अंक कार्यक्रम में से एक परिवार नियोजन द्वारा जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना था। 

इस कार्यक्रम के प्रभाव को समझने के लिए जनसंख्या डेटा का अध्ययन किया गया है। परिणाम को ग्राफ में देखा जा सकता है कि आपातकाल में सामान्य विकास दर से ही जनसंख्या बढ़ रही थी। सरकार योजना को अंजाम देने में विफल रही थी।

3. गरीबी दर

“गरीबी हटाओ” नारे का इस्तेमाल प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1971 में चुनाव के दौरान किया था। नीचे 1970 के दशक के दौरान गरीबी दर के आंकड़े प्लॉट किए गए हैं।

यह ग्राफ में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि 1971 के बाद गरीबी दर में तेजी से वृद्धि हुई। इंदिरा ने गरीबी दूर करने के वादे 1973 तक सफल नहीं हुए। लेकिन 1973 से 1977 के दौरान सकारात्मक संकेत देखे गए और हेड-काउंट इंडेक्स ग्राफ में तेजी से गिरावट आई। आपातकाल में, गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या में कमी आई। कुछ लोगों का मानना ​​है कि इस गिरावट के पीछे का कारण इंदिरा द्वारा लगाया गया जनसंख्या नियंत्रण था। इसका क्रियान्वयन भी विवादित रहा है।

4. साक्षरता

किसी देश की साक्षरता दर नागरिकों का जनसांख्यिकीय आंकड़ा देती है; कैसे वे अपने देश के विकास में योगदान करने के लिए बढ़ रहे हैं।

ऊपर दिया गया ग्राफ बहुत सकारात्मक संदेश दे रहा है और इसका मतलब है कि भारत की साक्षरता दर आपातकाल के दौरान प्रभावित नहीं हुई थी।

कुल मिलाकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि एक ओर जब लोकतंत्र प्रधानमंत्री के आवास में कैद था, तो साक्षरता अपनी अधिकतम गति के साथ बढ़ रही थी। इससे यह भी पता चलता है कि अब अधिक लोग सरकार द्वारा उठाए गए कदमों को समझने में सक्षम थे, और इंदिरा यह क्यों कर रही थीं, संभवतः यह भी समझ रहे थे। यह आज के लिए भी आधारशिला को मजबूत कर रहा था। यह अधिक बेहतर संविधान के साथ बेहतर भविष्य के लिए भारत का नेतृत्व कर रहा था। 

7. अन्त में

यह लेख 1975 में भारतीय आपातकाल की पूरी रूपरेखा को  चित्रित करता है। जिस आपातकाल को राष्ट्र की आंतरिक अशांति को नियंत्रित करने के लिए घोषित किया गया था, उसने मूल संविधान के ढांचे को बदल दिया। न्यायपालिका प्रणाली, जो न्याय और विश्वास का आधार है, भी भ्रष्ट हो गई थी। कुछ मंत्रियों, न्यायाधीशों और मीडिया ने आत्मसमर्पण किया और अपने कर्तव्यों को बचाना उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था। कुछ अखबार और मीडिया, जो कर्तव्यों को समझते हैं, प्रतिबंधित थे। सच्चाई के लिए सवाल उठाने वाले नेता, मंत्री, न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो गए। सत्य और न्याय का गीत गाने वाले लोग कैद कर लिए गए। नागरिक अपने मौलिक अधिकारों से वंचित थे। स्वतंत्रता केवल संसद के लिए थी, जो अपने काम और निर्णयों के लिए जवाबदेह नहीं थे। 

यदि इंदिरा सही थीं, तो उन्होंने सच्चाई और न्याय के सभी स्रोतों का दम क्यों घोंटा? उन्होने नागरिकों को न्यायपालिका, समाचार पत्र, मीडिया जैसी अपनी प्रणालियों से क्यों वंचित किया, जिसने स्वतंत्रता को प्रतिबंधित कर दिया था? केवल एक ही शब्द इस प्रकार के आपातकाल को परिभाषित कर सकता है, वह है ” लोकतांत्रिक ग्रहण “। लोकतंत्र का एक ग्रहण जो लोगों को संवैधानिक अधिकारों से वंचित करता है। इसने उन भावनाओं की हत्या कर दी, जो लोकतंत्र के नाम के साथ पैदा होती हैं।

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