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क्या शिक्षा व्यवस्था बेरोजगारी के लिए जिम्मेदार है?

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अवलोकन

  • वार्षिक रोजगार सर्वेक्षण 2019 के अनुसार 80% भारतीय इंजीनियर संबंधित क्षेत्र में नौकरी के योग्य नहीं हैं।
  • बड़ी संख्या में युवा नौकरी-सुरक्षा के लिए अपने अध्ययन के विषय से अलग क्षेत्र में रोजगार तलाशते हैं।

विषय – सूची  

  1. परिचय 
  2. क्या हैं युवाओं के लिए चुनौतियाँ ?
  3. क्या हैं इन चुनौतियों के स्रोत ?
  4. तमाम समस्याओं का निष्कर्ष
  5. अन्त में

1. परिचय

डेटा ट्रिब्यून एकबार फ़िर आपके समक्ष प्रस्तुत है, एक ऐसे लेख के साथ, जिसकी इस शिक्षा और प्रतियोगिता के दौर में सबसे अधिक माँग है। यह लेख देश के हर युवा के सामने उपस्थित चुनौती पर केंद्रित है। यह सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग विषय नहीं है लेकिन फिर भी यह देश की युवा पीढ़ी को प्रभावित कर रहा है। यह एक ऐसा विषय है जिसका सामना लगातार भारत की युवा आबादी को दैनिक आधार पर करना पड़ रहा है। यह वही युवा हैं जिनको अक्सर देश के उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला कहा जाता है।

हमारे युवाओं की सफलता की राह में बाधाओं के रूप में कई चुनौतियाँ खड़ी हैं। बेरोजगारी की चुनौती भारतीय युवाओं के लिए सबसे प्रमुख मुद्दा है। अपने कौशल के प्रति आत्मविश्वास की कमी इसका एक बड़ा कारण है। नौकरियों में सुरक्षा की चुनौती भी सामने है। इन चुनौतियों से जुड़े कई सवाल हैं जिनके जवाब की जरूरत हर किसी को महसूस होती है। युवावस्था न केवल एक व्यक्ति विशेष के जीवन का एक अहम पड़ाव है, बल्कि यह पूरे देश के विकास की आधार भी है। कोई भी चुनौती जो युवा पीढ़ी शिक्षा और विकास में बाधा पैदा करती है, राष्ट्र की वृद्धि में भी एक बड़ी बाधा है। तो आइए उन चुनौतियों के बारे में बात करते हैं, जिनका सामना हमारे युवा कर रहे हैं।

2. क्या हैं युवाओं के लिए चुनौतियाँ ?

हमने इस खंड में समस्या की जड़ को समझने के लिए, भारत की साक्षरता दर की जांँच की है। नीचे दिया गया ग्राफ  पिछले कुछ वर्षों में साक्षरता दर में आए बदलाव को दर्शाता है।  

literacy rate total youth population in india - The Data Tribune

उपरोक्त ग्राफ के अनुसार, हमारे देश की साक्षरता दर समय के साथ बढ़ रही है। लेकिन रोजगारों का क्या? क्या इन शिक्षित युवाओं के लिए उचित नौकरियाँ उपलब्ध हैं? जवाब है – नहीं।

youth unemployment rate india - The Data Tribune

ऊपर दिए गए ग्राफ से पता चलता है कि – भारत में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या कितनी तेजी से बढ़ी है। वहीं अगला ग्राफ तो और भी चौंकाने वाला है-

share of unemployed population by qualification 2019 - The Data Tribune
यह ग्राफ देश के शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की वृद्धि को दर्शाता है।

देखा जा सकता है कि इन बेरोजगारों में सबसे बड़ा प्रतिशत स्नातक (ग्रैजुएट) युवाओं का है!

इस अप्रत्याशित‌ संख्या के पीछे क्या कारण है? क्या वास्तव में शिक्षा युवाओं के व्यावसायिक कौशल को विकसित कर पा रही है? क्या यह सच है कि मार्कशीट पर नंबर केवल विषयों को रट लेने की क्षमताओं का प्रमाण हैं? क्या यह वास्तव में मायने रखता है कि छात्र सीख रहा है या नहीं? आज के युग में शिक्षा के माध्यम से वास्तविक ज्ञानार्जन पर ज़ोर नहीं दिया जा रहा है, मार्कशीट पर दिखने वाले अंकों को उच्च प्राथमिकता दी जाती है। यह वह सँख्या है जो वास्तविक योग्यता को नहीं दर्शा सकती, जो विद्यार्थियों को उनके कौशल के प्रति आत्मविश्वास नहीं देती है। आइए इसे नीचे दिए आँकड़ों से समझते हैं-

educational level wise enrollment in various programs as in india - The Data Tribune

उपरोक्त ग्राफ 2018-19 में विभिन्न पाठ्यक्रमों में नामाँकन की संँख्या दर्शाता है जो MHRD की रिपोर्ट से पता चला है। यह स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि नामाँकन की अधिकतम सँख्या स्नातक पाठ्यक्रमों के लिए थी। शैक्षणिक योग्यता के आधार पर बेरोजगारी के ग्राफ में हमने देखा कि सबसे बड़ा हिस्सा स्नातकों का है। उन स्नातकों का, जो अपने कौशल के प्रति स्वयं भी आश्वस्त नहीं हैं। दूसरे शब्दों में, शिक्षा प्रणाली केवल अँक प्रदान कर रही है, कौशल नहीं। साथ ही, एस्पायरिंग माइंड्स द्वारा किए गए एनुअल एम्प्लॉयबिलिटी सर्वे (2019) से पता चला कि 80% भारतीय इंजीनियर किसी भी नौकरी के लिए फिट नहीं हैं! इसका परिणाम अगले ग्राफ में देखा जा सकता है।

value of various degree earned - The Data Tribune

यहाँ, आंकड़ों के अनुसार, 2019 में 63% इंजीनियर सरकारी नौकरी की तलाश में थे। क्योंकि शिक्षा प्रणाली ने उन्हें अपने कौशल में विश्वास प्रदान नहीं किया है। वे सरकारी नौकरियों की तलाश करते हैं जो नौकरी की सुरक्षा प्रदान करती है।

कुल मिलाकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि, साक्षरता दर में वृद्धि केवल बेरोजगारी के संकट को बढ़ा रही है।

एक अन्य चुनौतीपूर्ण कारक अंग्रेजी भाषा है, जिसने आधिकारिक बातचीत और संचार के लिए मानक भाषा के रूप में लोकप्रियता हासिल की है। हिंदी दुनिया की चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। 52.83 करोड़ वक्ताओं के साथ भारत को सबसे बड़े हिंदी भाषी देश के रूप में मान्यता प्राप्त है। सबसे अधिक आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश है । यूपी शिक्षा बोर्ड, सबसे बड़ा प्रादेशिक बोर्ड है। मातृभाषा हिंदी और छात्रों के मामले में भारत का सबसे बड़ा बोर्ड होने के नाते, यूपी बोर्ड का हिंदी विषय का परिणाम बहुत अप्रत्याशित रहा है। हिंदी विषय में लगभग 8 लाख छात्र फेल हुए हैं, जो उनकी मातृभाषा है। पिछले कई वर्षों के परिणाम शिक्षा प्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं। सवाल सिर्फ एक विषय का नहीं है, वास्तविक प्रश्न मातृभाषा पर पकड़ के बारे में है। नीचे दिया गया ग्राफ देश की पीढ़ी के लिए हिंदी भाषा की दुर्दशा को दर्शाता है।

students ailed in hindi in india out total registered -The Data Tribunendia total

यह चुनौती उन स्कूलों से अँकुरित होती है जहाँ छात्रों द्वारा अंग्रेजी भाषा के प्रयोग पर बल दिया जाता है। उन्हें लगता है कि समाज में अपना उच्च स्थान बनाए रखने के लिए तथा नौकरियों के लिए अंग्रेजी बोलना अति आवश्यक  हैं। दूसरी ओर उन्हें लगता है कि हिंदी पास करना बहुत आसान है क्योंकि यह उनकी मातृभाषा है। यह सोच युवाओं में भी बरकरार रहती है, जो अपने पेशेवर कौशल में सुधार करने के बजाय कोचिंग इत्यादि लेकर अंग्रेजी कौशल में सुधार करते हैं।

3. क्या हैं इन चुनौतियों के स्रोत ?

युवा पीढ़ी के लिए चुनौतियों पर चर्चा करने के बाद, उन स्रोतों की पहचान करना महत्वपूर्ण है जो इन चुनौतियों का उत्पादन करते हैं। इसके स्रोत हमारे शिक्षण संस्थान, हमारे परिवार, हमारा समाज और हम ख़ुद भी हैं। 

हमारी शिक्षा प्रणाली बच्चों के रटने के लिए अँक देती है। जीवन के प्राथमिक चरणों में बच्चों को उनके कौशल पर काम करना या रचनात्मक होना नहीं सिखाया जाता है। बल्कि परीक्षा और बड़े पाठ्यक्रम का बोझ उन्हें सीखने से वंचित करता है। वे अच्छे अंक लाने के लिए पूरा पाठ्यक्रम रट लेते हैं। आखिरकार, हमारे माता-पिता भी सँख्या ही देखते हैं, ज्ञान नहीं। क्या इस तकनीक के युग में पाठ्यक्रम को रटना ठीक है? सभी छात्रों की अब इंटरनेट, कंप्यूटर तक पहुंच है, जो उनके सभी सवालों के जवाब दे देते हैं। फिर भी छात्र रचनात्मकता और शिक्षा की सार्थकता के बजाय रटने में अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। वे अँकों की प्रतियोगिता में इस तरह शामिल होते हैं, कि उन्हें समझ में नहीं आता है कि उनकी रुचि का विषय क्या है? वे अपनी रुचि से ही विलग हो जाते हैं। 

एक और पूर्वाग्रह विभिन्न विषयों के मानक से संबंधित है। गणित विषय वाले छात्र सबसे अच्छे माने जाते हैं, जीव विज्ञान वाले औसत हैं और वाणिज्य वाले कम स्तर के हैं। बीए पाठ्यक्रम वाले छात्रों को विज्ञान के छात्रों की तुलना में कम मेहनती माना जाता है। 

अन्य युवा जिन्होंने अपनी शिक्षा पूरी कर ली है, अपनी नौकरी के लिए अंग्रेजी के पीछे भागते हैं, क्योंकि हमारे माता-पिता, शिक्षक और बुजुर्गों ने हमें अंग्रेजी पर ध्यान देना सिखाया  और बताया कि अंग्रेजी कौशल, रोजगार के लिए दरवाजे खोलने की पहली कुंजी है। भारत में एक कड़वा सच यह है कि अंग्रेजी रोजगार के लिए एक बुनियादी कौशल बन गई है। अधिकाँश रिक्तियों के लिए कंपनियाँ अंग्रेजी संचार कौशल की मांग करती हैं। यहाँ तक ​​कि देश की शिक्षा प्रणाली भी उचित अंग्रेजी सिखाने का लक्ष्य बनाए रखती है। दिलचस्प बात यह है कि कई स्कूलों में हिंदी भाषा का इस्तेमाल करने पर छात्रों से जुर्माना वसूला जाता है। शिक्षा और कौशल के लिए यह मानसिकता बच्चों और युवाओं को कैसे प्रभावित करती है, आइए हम निम्नलिखित अनुभाग में चर्चा करें। 

4. तमाम समस्याओं का निष्कर्ष

यह खंड छात्रों और युवाओं के सामने आने वाली चुनौतियों के प्रभावों पर प्रकाश डाल रहा है। आइए स्कूलों में छात्रों के साथ शुरू करें, जिनसे हिंदी बोलने के लिए शुल्क लिया जाता है। कुछ छात्र बोलना ही कम कर देते हैं क्योंकि वे जुर्माना देने से डरते हैं। कक्षा में वे चुप रहते हैं, भले ही उन्हें किसी भी विषय में संदेह हो या उनके पास पूछने के लिए कोई प्रश्न हो, क्योंकि उन्हें लगता है कि वे अंग्रेजी में अच्छी तरह से संवाद नहीं कर सकते हैं।

विभिन्न पाठ्यक्रमों के मानकों ने हमारे दिमाग को इस तरह से जकड़ लिया है कि कुछ छात्र बीए में दाखिला लेते हैं। उन्हें लगता है कि वे बिना कक्षा में गए, बिना किसी मेहनत के स्नातक बन सकते हैं क्योंकि बीए करना आसान है और वे अपनी रुचि के कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना पसंद करते हैं।  

और अंग्रेजी के बारे में क्या कहना है, जैसा कि अंतिम खंड में चर्चा की गई है, जो छात्र बेरोजगारी से पीड़ित हैं, वे अंग्रेजी में सुधार करने के लिए दाखिला लेते हैं। आखिरकार, सभी ने उन्हें नौकरियों के लिए अंग्रेजी भाषा पर काम करने का सुझाव दिया है। एक और समस्या समाज की है, खराब अंग्रेजी संचार कौशल वाले व्यक्ति को अशिक्षित या वर्गहीन घोषित किया जाता है। ये कुछ ऐसी चीजें हैं जो अधिकाँश युवा अपने दैनिक जीवन में झेल रहे हैं। ये सभी सँघर्ष, चुनौतियाँ, केवल रोजगार और कमाई के लिए हैं। 

5. अंत में

चुनौतियों और उनकी उत्पत्ति पर चर्चा के बाद, यह पाया गया है कि हमारी मानसिकता, शिक्षा प्रणाली, और हम ख़ुद कुशल युवाओं के पतन के लिए जिम्मेदार हैं। हमारी मानसिकता युवाओं को चुनौती दे रही है। हमारी शिक्षा प्रणाली युवाओं को चुनौती दे रही है। छात्रों को पता नहीं है कि वाक्यों को रटने की आदत उनके जीवन को सीमित कर देगी। इस मानसिकता ने हमारे दिमाग पर इस तरह कब्जा कर लिया है कि हम उसके नौकर बन गए हैं। हम अपने कौशल को विकसित करने के बजाय तथा रचनात्मक होने के बजाय अंग्रेजी के लिए अपना समय बर्बाद करते हैं। संक्षेप में, हम हर नौकरी के लिए एक भाषा,  अंग्रेजी, के पीछे भागते हैं। एक नौकरी जो केवल हमारी बुनियादी जरूरतों के लिए भुगतान करेगी। क्या यह सच नहीं है कि हम अपनी भाषा में अधिक कुशलता से सीख सकते हैं? यह वाक्य कड़वा है, लेकिन यह सच्चाई है कि हमारी शिक्षा प्रणाली ने हमें जो सीखाया है, उसके प्रति विश्वास नहीं प्रदान किया है। इसलिए, जीने के लिए युवा अपने रुचि के साथ समझौता करने के लिए मजबूर हैं। वे अंत में नौकरी के लिए एक दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं जो सिर्फ पेट भरने के लिए भुगतान करेंगी। ज़रा सोचिए, अगर हर कोई किसी और पर निर्भर हो जाए, तो रोज़गार कौन देगा? निश्चित रूप से, बेरोजगारी बढ़ेगी। आइए शिक्षा के बारे में अपनी मानसिकता बदलें और इसे वास्तविक रूप में समझें। 

शिक्षा ही शिक्षा है। हमें सब कुछ सीखना चाहिए और फिर किसी मार्ग का चयन करना चाहिए। शिक्षा न तो पूर्वी है और न ही पश्चिमी, यह मानवीय है।

मलाला यूसूफ़जई

युवाओं को सीखने दें। उन्हें बढ़ने दें। उन्हें अपनी रुचि के कौशल विकसित करने दें। उन्हें इस बारे में आश्वस्त होने दें कि उन्होंने क्या सीखा है। उन्हें रचनात्मक होने दें। अंतत: हम देखेंगे कि अधिकांश युवा आत्मनिर्भर होंगे और दूसरों को भी रोजगार देंगे। यह बेरोजगारी से छुटकारा पाने की एकमात्र कुंजी है।

3 comments

  1. नीतू जी ! वर्तमान में युवा वर्ग के समक्ष बेरोजगारी वृद्धि का मूल कारण सरकारी नौकरी के प्रति विशेष झुकाव है। अधिकतम युवाओं का दृषटिकोण ये दर्शाता है कि उच्च शिक्षा लेकर सरकारी विभाग में जॉब करना है। दूसरी समस्या जातिगत आरक्षण का होना। आरक्षण जातिगत ना होकर आर्थिक आधार पर हो तो समाज के
    सभी उचित लोगो को उनके ज्ञान व कौशल के आधार पर जॉब मिल सकता है। बेरोज़गारी को कम या समाप्त करने के लिए युवा वर्ग को स्वरोजगार परक शिक्षा माध्यम अपनाना आवश्यक है। अपनी शिक्षा में तकनीकी शिक्षा को शामिल करना बेहतर होगा। घर में पैरेंट्स को भी अपने बच्चो की स्किल के अनुसार ही शिक्षा दे। आपका लेख अच्छा मार्गदर्शन करता है।
    धन्यवाद…….

    Liked by 1 person

  2. पढ़ने के लिए और अपनी राय साझा करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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